
हमारी संस्कृति
October 28, 2023
अर्चना कोहली 'अर्चि' / March 28, 2022
घर के आँगन में अब नज़र नहीं आती प्यारी-सी गौरैया
चहचहाहट से अपनी मुग्ध कर देती थी छोटी-सी चिरैया।
भोर होते ही झुंड के झुंड आकर भर देते आँगन सारा
चीं-चीं करके चहुँ ओर बहा देती थी प्रेम-रस की धारा।।
बिन उसके अब पता नहीं चलता है होने को है भोर
प्रिय चित्तचोर चिड़िया पता नहीं चली गई किस ओर।
कभी उनके कलरव से गूँजती थी वृक्ष की डाली- डाली
चुग-चुगकर फुदक-फुदककर खाती थी गेहूँ की बाली।।
संचय करके तृण-तृण एकत्र करके जो वह लाती थी
रोशनदान-खिड़की तरु कहीं पर भी बसेरा बना लेती थी।
सकोरे पर रखे पानी-बाजरे से खुशी-सरगम वह फैलाती
भूख प्यास शांत करके ऊँची उड़ान भरकर चली जाती।।
मनुज के कर्मों के दुष्परिणाम से आज आती नहीं नज़र
वृक्ष-कटाव और मोबाइल टावरों का उसपर फैला कहर।
आओ, विश्व गौरेया दिवस पर बचाने का उसे प्रण करें
स्नेह से देखभाल करके बेजुबान पक्षियों का त्राण करें।।
चित्र आभार: गूगल से
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