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अधूरी इच्छा

अर्चना कोहली अर्चि / November 17, 2025

अधूरी इच्छा

जेठ की एक तपती सुबह में सूरज की किरणें अंगार बरसा रही थी और हवा भी मानो उससे डरकर ठहर गई थी। ऐसे समय में शोभित को चुपचाप दरवाजे की और बढ़ते देख विनीता ने भौंहे चढ़ाते हुए पूछा, "इस समय अकेले- अकेले कहांँ जाने की तैयारी है?"

अपनी बरसों पुरानी चिरपरिचित मुसकान के साथ शोभित ने कहा, "कहीं नहीं, बस एक छोटा-सा काम है। वही करने जा रहा हूँ। नहीं तो मुझे क्या पड़ी है, इस गर्मी में झुलसने की।"
 
"सत्तर वर्ष के हो गए हो, पर अभी भी अपने को जवान समझते हो। कहीं गिर पड़े या चक्कर आ गया तो लेने के देने पड़ जाएँगे।"

 "तुम तो जरा-जरा की बात पर घबरा जाती हो। कोई छोटा बच्चा थोड़े हूँ, जो कोई उठाकर ले जाएगा। तुम्हारा बस चले तो कभी घर से निकलने ही न दो।"

“बातों में तो आपको जीतना बड़ा ही मुश्किल है । जाना ही है तो किसी को साथ ले जाओ। कोई साथी तो होना ही चाहिए।"

“पिछले पाँच-छह सालों से मैं कभी भी अपने साथी के बिना बाहर नहीं निकलता।" 

“कौन साथी? मुझे तो कोई भी नजर नहीं आ रहा। अभी मेरी आँखें इतनी भी खराब नहीं हुई हैं।”

शोभित ने छड़ी ऊपर उठाते हुए कहा—
“यह है मेरा साथी।”

आप भी! अच्छा जाइए, पर जल्दी ही आ जाना।

जो हुकुम मेमसाब! कहकर शोभित छडी़ ठोकते हुए  बाहर निकल गए।


कुछ दूर जाकर ऑटो को आवाज़ देकर  शोभित ने उसे बाजार में साड़ियों की दुकान पर छोड़ने को कहा।

बाजार में साड़ियों की दुकान पर•••

"भाई साहब, बनारसी साड़ी दिखाइए।”

*जी जरूर, पर अगर आप किस रेंज में और किसके लिए चाहिए बता दें तो आसानी हो जाएगी।"

“अपनी पत्नी के लिए। रेंज की चिंता मत कीजिए।"

"यह देखिए। कल ही नया कलेक्शन आया है।"

 एक-एक कर साड़ियाँ सामने आती गईं, पर शोभित की निगाह अचानक ऊपर रखी एक साड़ी पर अटक गई। 

"भाई साहब वह साड़ी दिखाइए।”

"जी लीजिए।"

साड़ी खुलते ही वर्षों पुरानी स्मृति शोभित के मन में उभर पड़ी और  वह साड़ी खरीदकर घर की ओर चल पड़े।


घर पहुँचने पर•••


“पिताजी। आप किधर गए थे। माँ भी मंदिर जाने को कहकर गई थीं, अभी तक नहीं लौटीं। कहा भी था कि मैं ले चलता हूँ, पर मानी नहीं।” दरवाजा खोलते ही बेटे विनीत ने कहा।

"जितनी बुराई  करनी है कर ले। फिर मौका मिले न मिले।" विनीता की पीछे से आवाज आई।

"माँ तुम आ गई। यह हाथ में क्या है! आप तो मंदिर गई थीं।"

"पहले अंदर तो आने दे, फिर दिखाती हूँ।"

 "बताओ न दादी क्या लाई हो?" पोती ने उत्सुकता से पूछा।

"कुछ नहीं बिटिया।" संकोच से विनीता ने कहा।

"बताओ न माँ, क्या लाई हो?" बेटे विनीत ने पूछा।

"वो अगले सप्ताह हमारी शादी की पचासवीं सालगिरह है न तो•••"

"और पिताजी इतनी गर्मी में आप कहाँ गए थे?"

"मैं भी तेरी  माँ के लिए कुछ लेने गया था।"

"तो इसमें छिपाने वाली कौन सी बात थी। हम आपको खुद ही बाजार ले जाते।"

"बेटा, हम वो क्या कहते है, सरप्राइज़ देना चाहते थे।" शोभित और विनीता एक
साथ  बोल पड़े। 

"अब तो अपना सरप्राइज़  दिखला  दो। अब तो वह खुल गया।"

"ठीक है।"

"सुनो जी, पहले आप दिखलाइए।"

"खुद ही देख लो।"

"अरे वाह, बनारसी साड़ी! कितनी प्यारी है।आपने मेरी अधूरी इच्छा पूरी कर दी। मुझे तो लगा था, इस जन्म में वह अधूरी ही रह जाएगी।" छलक आए आँसुओं को पोंछते हुए विनीता ने कहा।

"अधूरी इच्छा! माँजी मैं समझी नहीं।" बहू सौम्या ने हैरानी से कहा।

"बहू, जब मेरी शादी हुई थी, तब मुझे 
बनारसी साड़ी पहनने की बहुत इच्छा थी लेकिन  संयुक्त परिवार और आर्थिक स्थिति के कारण वह इच्छा पूरी न हो सकी।"

"मेरे होते कैसे अधूरी रह जाती। मैंने सोचा ही था, शादी की पचासवीं सालगिरह पर तुम्हें उपहार में बनारसी साड़ी दूँगा। अच्छा छोड़ो पुरानी बातें, यह तो बताओ, तुम मेरे लिए क्या लाई हो?" शोभित ने पूछा।

"आपकी पसंद का गोल्डन फ्रेम का चश्मा।"

"वाह! आपके प्रेम के आगे तो सौ ताजमहल भी कम हैं।" बेटा-बहू
एक साथ बोले। जबकि इन सबसे बेखबर शोभित और विनीता एक दूसरे की आँखों में खोए हुए थे।

अर्चना कोहली अर्चि (नोएडा)

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