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सब कुछ बिकता यहाँ

अर्चना कोहली 'अर्चि' (नोएडा) / January 26, 2026

सब कुछ बिकता यहाँ

खुली शिक्षा की दुकानें
हर एक 
गली-गली, 
विद्या का होता 
जहाँ सरेआम व्यापार।

कुछ नोटों के बदले में
बेच रहे ईमान,
मंदिर थे 
जो ज्ञान के
बन गए अब वे बाजार।

शिक्षा-संस्थानों की इस
भीड़ में, 
कसौटी पर 
योग्यता नहीं पैसा उतरे।
 
बच्चों के भविष्य की कहाँ 
उनको 
है चिंता
परवाह  है बस
यही कैसे पाएँगे वे नोट।

नैतिकता-मूल्य सब कुछ 
ताक पर रखे 
लक्ष्य उनका 
बस यही एक 
जेब उनकी सदा हो भारी।

खाली जिनके भी हाथ हैं, 
फाँक रहे 
वे धूल
प्रवेश मिलता
उनको जो दिखाता नोट। 

डिग्रियाँ हों या होते पेपर
सब कुछ 
बिकता यहाँ,
विद्या मंदिर के 
पुजारी अब बैठे खोल दुकानें ।

अर्चना कोहली अर्चि (नोएडा)

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