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कहीं तुम राधिका तो नहीं

अर्चना कोहली अर्चि / November 24, 2025

कहीं तुम राधिका तो नहीं

“संजना, इतनी सुबह-सुबह कहाँ गई थी? कितनी देर से इंतजार कर रहा हूँ।" मिस्टर अशोक जी ने दरवाज़े पर खड़ी बेटी राधिका को देखते ही एक साँस में पूछ लिया।

राधिका एक पल को ठिठकी… फिर मुसकराने का प्रयास करते हुए बोली—
“पापा, मैं आपकी बेटी राधिका हूँ, संजना नहीं।”

"तुम्हारी मजाक करने की आदत अभी तक नहीं गई। क्या मैं तुम्हें जानता नहीं?  बताओ न कहांँ गई थी। मुझे बताया भी नहीं।" पेशगी पर बल डालकर मिस्टर अशोक ने कहा।

यह सुनकर राधिका की आँखें  भर आईं, मम्मा का लंबी बीमारी के बाद निधन हुए पूरे दो साल हो गए, पर पापा की यादों में वे आज भी जीवित हैं। 

"किस सोच में डूब गई संजना?" राधिका का हाथ पकड़कर मिस्टर अशोक ने कहा।

"कुछ नही। बस कुछ पुरानी बात याद आ गई। अब जल्दी कीजिए, डॉक्टर के पास जाना है।" 

"पर डॉक्टर के पास क्यों जाना है? मैं तो बिलकुल ठीक-ठाक हूँ।"

"बस रूटीन चेकअप के लिए। आजकल आप बहुत कुछ भूलने लगे हैं। कभी गैस जलाकर बंद करना भूल जाते हैं तो कभी सब्जी का नाम भूल जाते हैं तो कभी अपना चश्मा तो कभी बात अधूरी छोड़ देते हैं।"

"शादी को पचास वर्ष हो गए, तुम अभी तक वैसी की वैसी हो। छोटी-छोटी बातों पर घबरा जाती हो। भूलना कोई बीमारी नहीं है। उम्र बढ़ने पर ऐसा ही होता है। तुम भी तो भूल जाती हो। याद है न रास्ते तो अब तक याद नहीं रह पाते तुम्हें।"

"फिर भी एक बार दिखाने में हर्ज ही क्या है?"

"ठीक है भई। मानोगी थोड़े न।"

डॉक्टर ने राधिका से बातचीत द्वारा मिस्टर अशोक के बारे में जानकारी ली। कुछ टेस्ट करवाने को कहा। टेस्ट की रिपोर्ट आने पर राधिका उसे डॉक्टर को दिखाने गई। 

रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने  गहरी साँस लेते हुए पीठ कुर्सी के पीछे टिकाई  और राधिका से कहा, मेरा शक बिलकुल सही निकला।"

"कैसा शक डॉक्टर साहब?"

"यही कि आपके पापा अल्जाइमर बीमारी की ओर बढ़ रहे हैं।"

"अल्जाइमर!" राधिका का दिमाग सुन्न-सा हो गया। 

"हाँ अल्जाइमर। इस बीमारी में दिमाग की कोशिकाएं मरने लगती हैं, जिससे आदमी की यादें धुँधला जाती है। वह धीरे-धीरे सब कुछ भूलने लगता है  यहाँ तक खुद को भी।"

"क्या इसका कोई इलाज नहीं? राधिका ने पूछा।

"नहीं, पर प्यार,देखभाल और दवा से इसे कम जरूर किया जा सकता है।"

सोमेश से बात करके राधिका पापा को अपने घर ले गई। अब इस हालत में उन्हें अकेले तो छोड़ा नहीं जा सकता था। माँ तो पहले ही चली गई, कहीं पिताजी भी•••

राधिका के इस कदम से लोगों को बातें बनाने का एक चटपटा मसाला मिल गया। कोई कहता, देखने में तो राधिका बहुत सीधी-सादी लगती है पर असल में बहुत काँइया तो कोई कहता, मुझे तो साफ-साफ जायदाद का चक्कर लगता है, नहीं तो कौन बीमार बुड्डे पिता की सेवा करता है तो कोई बात जादू-टोने पर ले आता।

 लोगों की बातें राधिका के कानों में पिघले शीशे की तरह उतरती। एक दिन उसने भरी आंखों से सोमेश से पूछा, "क्या तुम्हें भी लगता है,  पिता जी को घर लाकर मैंने कुछ गलत किया। क्या इसमें मेरा कोई स्वार्थ है मैं तो बस उन्हें अकेला नहीं छोड़ना  चाहती थी। कहीं कुछ हो जाता तो पूरी जिंदगी अपने आप को माफ नहीं कर पाती।"

"लोगों का तो काम  ही है, कुछ न कुछ कहना। उनकी बातों की परवाह मत करो। बस पिता जी का ध्यान अच्छी तरह से रखो।"

 "तुम्हारा साथ न होता तो मैं नहीं कर पाती। बहुत थक जाती हूँ।"

"थकावट तो होगी ही। उनकी हर जरूरत का ध्यान रखना, दवाई समय पर देना, घुमाने ले जाना, उनको उनके अतीत से परिचित करवाना। यह जानते हुए भी वे तुम्हें नहीं पहचानते, कितना मुश्किल है।"

"पर मुझे तो पता है न, मैं उनकी बेटी हूँ।  जिन्होंने हर पल मेरा साथ निभाया। आज मेरी बारी है। बस लोगों की बातें मुझे तोड़ देती हैं।"

"उनकी चिंता मत करो, बस पापा का ध्यान रखो। कभी न कभी तो लोगों की सोच बदलेगी। वो तुम्हें समझेंगे।"

धीरे-धीरे राधिका की मेहनत रंग लाने लगी।  राधिका के प्यार और समर्पण ने लोगों की सोच बदल दी। फिर एक दिन मिस्टर अशोक ने कहा, तुम्हारा चेहरा मेरी बेटी से मिलता है, कहीं तुम राधिका तो नहीं!"

"राधिका कहने ही वाली थी, आखिर मेरी मेहनत रंग लाई। आपने मुझे पहचान लिया कि अचानक मिस्टर अशोक बोल पड़े, "संजना वो लड़का कौन है जो साथ रहता है? मैं उसे पहचानता नहीं, और राधिका अभी तक खेलकर वापस नहीं आई क्या!"

राधिका की आँखें छलछला उठी। भीतर काँच की किरचोँ-सा मानो कुछ टूटकर बिखर गया। वह बुदबुदा उठी, मैं ही तो आपकी राधिका हूँ,  जिसे बचपन में आपने उँगली पकड़कर चलना सिखाया, हर पल मेरे साथ खड़े रहे। वहीं राधिका आज आपको याद नहीं•••

अपनी उस गुड़िया को पहचानने में आपको  कठिनाई हो रही है। कोई नहीं, भले आप मुझे भूल जाएँ, पर मैं  हमेशा आपको अपनी पहचान से अवगत करवाने के लिए हर पल एक नई सुबह के इंतजार में साथ ही खड़ी  मिलूँगी। आप मुझे पहचाने या नहीं मैं कोशिश करती रहूँगी, क्योंकि कभी न कभी आपकी यादों पर जो घना कोहरा छा गया है, वह हट जाएगा और पहले की तरह आप अपनी इस राधिका को प्यार और अपनेपन से फिर से गले लगा लेंगे, ऐसा मुझे दृढ़ विश्वास है। राधिका ने धीरे-से पापा के  हाथ पर अपना हाथ रखते हुए मन में कहा।

अर्चना कोहली 'अर्चि' (नोएडा)
मौलिक और अप्रकाशित

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