
हमारी संस्कृति
October 28, 2023
अर्चना कोहली 'अर्चि' / February 11, 2017
ऐ जिंदगी क्षणभर को ठहर जा
ढलती शाम को मैं रोक लूँ जरा।
टूटते अल्फाजों से कुछ कह दूँ
डगमगाते कदमों से तुझे थाम लूँ।।
ऐ हमसफर साथ मेरा न छोड़ना
थामकर हाथ मेरा सदा ही चलना।
श्वास रुकने तक यूँ ही संग रहना
बाहों पर अब भी निश्चिंत सोना।।
संध्या का अवसान अब समीप है
ढलती उम्र का अंत अब समीप है।
मजबूर न तू अपने को समझना
मजबूती से मुझे थामकर चलना।।
सुंदर यादों का मंजर ख्वाबों में है
एक साथ मिलकर हम याद करेंगे।
उम्र के इस मोड़ पर सब छोड़ चले
एक तुम्हीं ने साथ मेरा निभाया।।
आओ, प्रेमभरी नजरों से देख लूँ
फिर से तुझे जीभरकर निहार लूँ।
प्रेम की नई इबारत मिलकर लिखें
अंतिम पड़ाव पर हँसी-खुशी चलें।।
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