
हमारी संस्कृति
October 28, 2023
अर्चना कोहली 'अर्चि' / March 29, 2016
ओ नारी रूप हैं तेरे प्रचुर
हरेक रूप है जुदा-सुंदर।
कभी तू सबला नजर आती
परिधि में कोई बाँध न पाता।।
कभी तू अबला बन जाती
चुपचाप सारे गम पी जाती।
मयंक सी शीतल भी तू नारी
भानु समान कड़क भी नारी।।
माँ बनकर अमृत धारा बहाती
गुरु बन भविष्य हमारा बनाती।
वधु बन कुल-लक्ष्मी कहलाती
बेटी बन घर की रौनक बनती।।
बहन बन प्राण न्योछावर करती
कभी प्रिय सखी मेरी बन जाती।
सास बन बहू पर हुकूमत करती
तो कभी बहू बनकर सेवा करती।।
बेटी-माँ-पत्नी-सास-ननद- बहन
ओ नारी रूप हैं तेरे बहुसंख्यक
हर रूप दूसरे से है अलग-न्यारा।।
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