
बदलता परिवेश
September 27, 2024
अर्चना कोहली 'अर्चि' / April 01, 2025
टूटा चश्मा
"क्या बात है सुनैना। अभी तक तैयार नहीं हुई? पटोला साड़ी लेने नहीं चलना क्या!" पति शेखर ने कहा।
"नहीं।" सुनैना ने एक शब्द में उत्तर दिया।
"पर क्यों? तीन महीने से तो पीछे पड़ी हुई थी। अब क्या हुआ?"
"अब बोलो भी। जुबान पर ताला क्यों लग गया।" पति शेखर ने सुनैना को चुप देखकर खीजकर कहा।
"अभी मम्मी जी को चश्मे की ज्यादा ज़रूरत है। उनके चश्मे का एक फ्रेम टूट गया है। साड़ी तो इंतज़ार कर सकती है।"
मम्मी ने मुझे तो नहीं बताया। अब बेटे से बहू प्यारी हो गई।" दुखी होकर शेखर ने कहा।
"मुझे भी पहले कहाँ पता था, वो तो आज सुबह चाय देने गई तो टूटे चश्मे से अखबार पढ़ने की कोशिश कर रही थी। मैं ही जबरदस्ती चश्मा बनवाने के लिए लेकर आई। सोचा था, आप आएँगे तो चश्मा बनवाने चलेंगे। आप नाराज़ मत हो।" सकुचाते हुए सुनैना ने कहा।
"इसमें नाराजगी की क्या बात है। तुम्हारे होते मुझे कोई चिंता नहीं। चलो अब बाज़ार चलते हैं चश्मा बनवाने!"
उधर दरवाज़े की ओट पर खड़ी मम्मी जी की आँखें दोनों की बातें सुन भर आईं। मन ही मन उनकी बलाएँ लेकर धीरे-धीरे वे अपने कमरे की ओर चल दी।
अर्चना कोहली 'अर्चि' (नोएडा)
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